बुधवार, 9 सितंबर 2015

राहुल इंतजार करें...

राहुल इंतजार करें...
09 सितम्बर 2015, नई दिल्ली। कल कांग्रेस वर्किंग कमिटी द्वारा पारित एक प्रस्ताव में सोनिया गांधी का कांग्रेस अध्यक्ष के तौर पर कार्यकाल एक साल के लिये बढ़ा दिया गया। श्रीमति गांधी का कार्यकाल दिसंबर में खत्म हो रहा था। इसके साथ ही राहुल गांधी द्वारा कांग्रेस की कमान संभाले जाने की अटकलों पर फिलहाल विराम लग गया है। देश की सबसे पुरानी पार्टी को अभी भी उसके सबसे लंबे समय तक कार्यरत अध्यक्ष की सेवाओं की जरुरत है। शायद कांग्रेस के युवराज को पार्टी ने अभी इस लायक नही समझा कि उन्हे कमान सौंप दी जाये और उन्हें और परिपक्व होने का मौका दिया जाना चाहिये। पिछले छह महीने के दौरान सोनिया ने जिस तरह से संसद के भीतर और बाहर मोर्चा संभाला है उससे तो ये साफ हो जाती है कि कांग्रेस की डूबती नैया को उबारने का माद्दा अभी  उनमें है। पिछले लोकसभा चुनाव में अब तक के न्यूनतम स्तर पर आने के बाद ये लगने लगा कि कांग्रेस को कोई करिश्माई ताकत ही बचा पायेगी क्योंकि राहुल गांधी में वो बात नजर नहीं आ रही थी। भूमि अधिग्रहण बिल पर जिस तरह से सरकार को कांग्रेस ने संसद में मजबूर कर दिया वो सोनिया गांधी का नेतृत्व ही था। 14 विपक्षी दलों को एकजूट कर संसद की कार्यवाही बजट और मानसून सत्र में ना चलने देने का करिश्मा राहुल के वश की बात नही थी और शायद वे उनके नेतृत्व को स्वीकार भी नही करते। महज 44 सीटों पर सिमट चुकी कांग्रेस के लिये ये दौर किसी मुसीबत से कम नही है लेकिन इस दौर में पार्टी का नेतृत्व पर भरोसा कायम रहे बड़ी बात है। वैसे ये वो कांग्रेस पार्टी नही है जिसमें कई कद्दावर और जमीनीस्तर के नेता हुआ करते थे। अब जो नेता कांग्रेस में मौजूद है उनमे से किसी में इतनी कूव्वत नही है कि नेतृत्व के किसी भी फैसले पर सवाल खड़े कर सकें। आज कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती पार्टी और संगठन को मजबूत करने की है और इसके लिये प्रयास शुरू भी हो गये हैं। राहुल गांधी को इस बात की जिम्मेदारी भी दी गयी है। पार्टी के कई वरिष्ठ नेताओं का मानना है कि राहुल इस काम के जरिये पार्टी पर और पकड़ बना पायेंगे और सोनिया गांधी बिहार जैसे राज्य, जहां पार्टी बदतर हालात में है, में अन्य दलों के साथ मिलकर पार्टी को मजबूती प्रदान करेंगी। पार्टी के भीतर एक और मुद्दा है जो हावी है और वो है वरिष्ठ और पुरानी पीढ़ी के नेता जो सोनिया के साथ सहज महसूस करते है तथा नये नेता जो राहुल के साथ अपने को जोड़कर चलते है। राहुल को अध्यक्ष पद पर बिठाने की जल्दबाजी उन्हे है जो सरकार और पार्टी में राहुल कोटे से पदासीन थे, लेकिन पार्टी के ज्यादातर धड़े सोनिया को ही अध्यक्ष देखना चाहते है। पार्टी में किसी तरह की जोर-आजमाइश से बचने के लिये दोहरे नेतृत्व की नीति पर चलने की कवायद हो रही है। राहुल की ताजपोशी आज नही तो कल होनी तय है लेकिन सारी कवायद इस बात की है कि पार्टी के किसी भी असफलता के लिये उन्हे जिम्मेदार ना ठहराया जाये। बिहार में चुनाव सामने है और वहां कांग्रेस की हालत किसी से छिपी नही है। अगले साल असम, केरल, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु और पुड्डुचेरी में चुनाव होने हैं। कांग्रेस असम और केरल में सत्ता में है लेकिन असम में सत्ता वापसी की संभावना क्षीण है। केरल में यूडीएफ जिसका नेतृत्व कांग्रेस कर रही है, भ्रष्टाचार के आरोपों में घिरी है लेकिन पार्टी को उम्मीद है कि बीजेपी (जो वामदलों के क्षेत्र में तेजी से पैठ बना रही है) के डर से जनता वापस उसे एक और मौका देगी। तमिलनाडू, पश्चिम बंगाल और पुड्डुचेरी में कांग्रेस सत्ता की दौड़ से बाहर है। ऐसे में कांग्रेस नही चाहती कि राहुल के अध्यक्ष बनते हीं इन नाकामियों से सामना हो और सारा श्रेय उनके हीं खाते में आये। शायद ये वो वजह है जिसके कारण राहुल को अगले एक साल तक और इंतजार करना होगा। इंतजार............!

मंगलवार, 8 सितंबर 2015

अंधविश्वास के बहाने

अंधविश्वास के बहाने

भारत एक धार्मिक देश है लेकिन संविधान इसे धर्मनिरपेक्ष कहता है। यहाँ के लोग अपने धर्म को खुल कर स्वीकार करते है और उसमें अपने तरीके से श्रद्धा भी जाहिर करते है। आमतौर पर अधिकांश भारतीय अपने धर्म में आस्था रखते है और समय समय पर इसका प्रदर्शन भी करते है। भारत का संविधान इसकी इजाजत भी देता है। हाल के दिनों में धार्मिक जनगणना जारी की गयी है और ये इस बात का सबूत है की लोग अपने धर्म को लेकर कोई छिपाव इस देश में नहीं करते। हिन्दू बहुल इस देश में धार्मिक अल्पसंख्यक भी अपने धर्म और आस्था को मानने के के लिए स्वतंत्र है। ये इस बात का सबूत है कि भारतीय खासकर हिन्दू धार्मिक तौर पर सहिष्णु है। दुनिया के बाकी हिस्सों में शायद ही इस तरह की परिस्थिति बनती है। लेकिन हाल के दिनों में हिन्दू धर्म के बारे में जिस तरह के दुष्प्रचार समुदाय के भीतर और समुदाय के बाहर से देखने को मिले है वो दुखद है। कुछ लोग स्वार्थवश या कहें अपने को बुद्धिमान साबित करने के लिए ऐसा करते है। लेकिन उन्हें यह नही पता कि वे ऐसा करते हुये दूसरों की भावनाओं को ठेस पहुँचाते है। कुछ उनसे भी बड़े बुद्धिमान उन्हे ऐसा करने से रोकने की हर संभव कोशिश करते है। नतीजा होता है हिंसा।
भारत के संविधान की धारा 19(1) के जरिये सभी को अपनी बात कहने का अधिकार प्राप्त है। लेकिन उसी धारा का दुसरा हिस्सा इस अधिकार पर कुछ वाजिब रोक(Reasonable Restriction) भी लगाता है। इस हिस्से में संविधान अपनी बात कहने के दौरान नैतिकता और सद्भावना का ख्याल रखने की हिदायत भी देता है। लेकिन अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की दुहाई देने वाले लोग अपनी बातों को कहने के दौरान अक्सर संविधान की इस नसीहत की उपेक्षा करते पाये जाते है। कोई व्यक्ति धर्म को माने या न माने उसे इस बात के लिये भारतीय कानून से छूट मिली हुई है, लेकिन उसे वो दूसरो पर थोपे संविधान इसकी इजाजत हरगिज नही देता। हाल के दिनों में देश में कुछ इस तरह की धटनायें धटित हुई है जो भर्त्सनिय है। लेकिन ये धटनायें हमें ये सोंचने पर मजबूर करती है कि क्या हम इतने असहिष्णु पूर्वकाल से ही हैं। इसका जवाब है - नहीं।

हिंदु धर्म सनातन धर्म है। इस बारे में मुझे तो कोई संशय नही है। इसमें सबको समाहित करने की शक्ति है। इससे न जाने कितने धर्म और मत अलग हुये लेकिन इसे किंचित् भी फर्क नही पड़ा। हिंदु धर्म में 33 करोड़ देवी-देवताओं की मान्यता है। कहीं वैष्णव, शैव, शाक्त तो कहीं सगुण, निर्गुण विभाजन की कमी नही। साधु-संतो की भी कमी नही। धर्मगुरूओं की भी कमी नही। अपनी-अपनी मान्यताओं का प्रचार-प्रसार करना है। प्रचार के लिये साधन और संसाधन जुटाने है, दुकान तो सजानी पड़ेगी। दुकान सज गयी तो व्यपार तो होगा ही और व्यपार होगा तो धर्म कहाँ? लेकिन सबसे बड़ा सवाल तो ये है कि जो सनातन है, समाहित करने की शक्ति वाला है, उसे, चंद व्यपारी जो संयोगवश धर्म के पुरोधा बन बैठे है, के हाथों की कठपुतली बनने देना चाहिये? इसी बात का और कठपुतली बनने का फायदा उठा कर दुकान सजाने वाले लोग जब अपने व्यापार पर खतरा महसूस करते है तो आक्रामक हो उठते हैं। अपने उपर आने वाले सभी खतरों को निर्मूल करना चाहते है। आज जो लोग इस असहिष्णुता के निशाने पर उन्हे भी इस बात को समझना होगा कि अपनी बात कहने का हक तो उन्हें है, लेकिन इस दौरान उन्हें संविधान और कानून के दायरे में रहकर अपनी बात करनी चाहिये। जनमानस और भावनाओं का ख्याल रखिये। सबके भावनाओं का ख्याल नही कर सकते तो कम से कम बहुसंख्यक की भावनाओं का तो ख्याल रखिये। 

रविवार, 6 सितंबर 2015

सनातन गुरु -श्री कृष्ण

सनातन गुरु -श्री कृष्ण
05/09/2015 : नयी दिल्ली। आज श्री कृष्णा जन्माष्ठमी है और साथ ही शिक्षक दिवस। ये एक विशिष्ट संयोग है कि आज ही के दिन युग स्रष्टा श्री कृष्ण के पावन अवतरण दिवस के मौके पर भारत में शिक्षक दिवस भी मनाया जा रहा है। शिक्षक दिवस महान शिक्षाविद् डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन के जन्मदिवस के मौके पर 5 सितम्बर को साल 1962 से मनाया जा रहा है। ये एक सुखद संयोग है कि डॉ राधाकृष्णन बीसवी सदी के धर्म एवं दर्शन के महान विद्वान थे। वे भारत के प्रथम उपराष्ट्रपति और दूसरे राष्ट्रपति थे। अद्वैत वेदांत के दर्शन को मानने वाले डॉ राधाकृष्णन ने इसकी समकालीन पुनर्व्याख्या की। उनके विचार में शिक्षक को देश का सर्वश्रेष्ठ दिमाग होना चाहिए। लेकिन जो बाजारीकरण समाज में व्याप्त हो चला है, उसमें ये कितना प्रासंगिक है ये विचारणिय बिंदु है। गुरु-शिष्य का भाव समाप्त हो गया है परंपरा तो दूसरी दुनिया की बात होगी। शिक्षक दिवस के मौके पर केवल शिक्षक या गुरु को याद कर अपने जीवन में उनके योगदान को सिर्फ याद कर सकते है लेकिन उचित गुरूदक्षिणा तो उनके दिखाये मार्ग पर चलकर ही दी जा सकती है।
गुरु कौन है? गुरू वो है जो शिष्य के हित के लिए शिष्य को ज्ञान देता है। ये एक परिभाषा हो सकती है लेकिन सभी ग्रंथो का सार भी यही है। ये एक विराट परिकल्पना है जो साधारण तरीके से नही समझी जा सकती। इसके लिए हमें ज्ञान को समझना होगा। ज्ञान एक विशाल अवधारणा है जो बिना गुरू के समझ नही आती। ज्ञान का मतलब केवल विषयी ज्ञान नही होता बल्कि वो समग्र जानकारी है जो एक मनुष्य के जीवन में हर कदम पर काम आती है। ये वो अनुभव है जिसे करने के बाद मनुष्य पूर्णता का अनुभव करता है। वो अनुभव जो अर्जुन को श्रीकृष्ण ने कुरुक्षेत्र में कराया। श्री कृष्ण ने न केवल अर्जुन को ज्ञान का बोध कराया बल्कि उनके द्वारा पूरे ब्रम्हांड को उस अवधारणा से परिचित कराया। मात्र 700 श्लोकों के माध्यम से जो ज्ञान श्रीबिहारी जी ने सृष्टि को दिया उसे ग्रहण करने योग्य बनने के लिये कई जन्मों की साधना की आवश्यकता होती है। सांख्य योग, कर्म योग और भक्ति योग के माध्यम से जो संदेश श्रीकृष्ण ने दिया है उसे ग्रहण कर मनुष्य ज्ञानवान हो परमगति को प्राप्त कर लेता है। इसीलिये श्रीकृष्ण को जगतगुरु कहा जाता है।
वसुदेवसुतं देवं कंसचाणूरमर्दनम्
देवकीपरमानन्दं कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम् ॥ १॥

आतसीपुष्पसङ्काशम् हारनूपुरशोभितम्
रत्नकण्कणकेयूरं कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम् ॥ २॥

कुटिलालकसंयुक्तं पूर्णचन्द्रनिभाननम्
विलसत्कुण्डलधरं कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम् ॥ ३॥

मन्दारगन्धसंयुक्तं चारुहासं चतुर्भुजम्
बर्हिपिञ्छावचूडाङ्गं कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम् ॥ ४॥

उत्फुल्लपद्मपत्राक्षं नीलजीमूतसन्निभम्
यादवानां शिरोरत्नं कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम् ॥ ५॥

रुक्मिणीकेळिसंयुक्तं पीताम्बरसुशोभितम्
अवाप्ततुलसीगन्धं कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम् ॥ ६॥

गोपिकानां कुचद्वन्द्व कुङ्कुमाङ्कितवक्षसम्
श्री निकेतं महेष्वासं कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम् ॥ ७॥

श्रीवत्साङ्कं महोरस्कं वनमालाविराजितम्
शङ्खचक्रधरं देवं कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम् ॥ ८॥

(श्रीकृष्णाष्टकम स्त्रोत – www.sanskritdocuments.org)

शनिवार, 5 सितंबर 2015

यूँ मुलायम का जाना...

यूँ मुलायम का जाना...
04 /09/2015 : नयी दिल्ली। बिहार चुनाव के ठीक पहले समाजवादी पार्टी द्वारा बिहार विधान सभा चुनाव अकेले लड़ने का ऐलान राजनीतिक गलियारे में किसी अचरज के तौर पर नहीं आई। सीट बंटवारे को लेकर नाराज चल रही मुलायम सिंह यादव की ये पार्टी बिहार की राजनीति में कोई बड़ा दबदबा नहीं रखती। जनता परिवार से सपा का अलग होना मोदी-मैजिक को चुनौती देने के विपक्ष के एकीकृत प्रयासों को धक्के के तौर पर देखा जा रहा है। अब से तक़रीबन चार  महीने पहले बड़े ही धूम-धाम से जनता परिवार के एका की घोषणा की गयी थी। मुलायम सिंह यादव को इस परिवार का सर्वमान्य मुखिया घोषित किया गया था। इस परिवार में समाजवादी विचारधारा के वे दल शामिल हुए थे जो मोदी-मैजिक के कारण अपनी अस्तित्व खोने के कगार पर है। मुलायम सिंह यादव की समाजवादी पार्टी, नीतीश कुमार नीत जेडी-यू, चारा घोटाला में सजायाफ्ता लालू यादव की राजद, एच डी देवगौड़ा की जेडी-एस, शिक्षक भर्ती घोटाला में सजा काट रहे ओम प्रकाश चौटाला की आईएनएलडी और पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय चंद्रशेखर की नेतृत्वविहीन समाजवादी जनता पार्टी सहित इन छह पार्टियों का विलय होना तय हुआ था। लेकिन इसकी घोषणा के बाद ही समाजवादी पार्टी में भारी अंतर्विरोध देखने को मिला और रामगोपाल यादव जैसे कई नेता इस मामले में मुखर दिखाई पड़े। तभी से इस विलय को लेकर असमंजस की स्थिति बनी हुयी थी। परिणति सीट बंटवारे में सिर्फ पांच सीट मिलने को लेकर उपजी नाराजगी के रूप में हुयी। समाजवादी पार्टी ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर अकेले बिहार विधान सभा चुनाव लड़ने का ऐलान कर दिया। साल 2010 के बिहार विधान सभा चुनाव में महज 0.55 फीसदी वोट पाने वाली सपा राज्य में कोई बड़ा उलटफेर करेगी ऐसा तो संभव नहीं पर एक सन्देश साफ़ तौर पर जाएगा जो मोदी-विरोधियों के हित में नहीं होगा। कल लालू यादव और शरद यादव सपा प्रमुख को मनाने उनके घर पर पहुंचे और करीब दो घंटों तक चली मुलाकात बेनतीजा रही।
मुलायम सिंह यादव का ये यू-टर्न पहला तो नहीं है लेकिन इसके पीछे कोई कारण है या मजबूरी? पहले हमें मुलायम को समझना होगा कि अपने साथियों को धोखा देने की उनकी ये आदत पुरानी है। सबसे पहले 1989 में जब वीपी सिंह कांग्रेस से अलग हुए तो अपने मित्र चंद्रशेखर को छोड़कर मुलायम उनके साथ हो लिए। इसके बाद साल 1990 में जब वीपी सिंह की सरकार गिरी तो वापस चंद्रशेखर को प्रधानमंत्री के लिए समर्थन देते हुए उनके साथ हो लिए। बसपा के संस्थापक कांशीराम ने 1991 में लोकसभा चुनाव के दौरान मुलायम के समर्थन को स्वीकार किया जबकि वो खुद इटावा से जीतने की स्थिति में थे। फिर 1993 में उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव में बीजेपी को सत्ता से दूर रखने के लिए बसपा ने मुलायम सिंह के साथ गठजोड़ कर उन्हें मुख्यमंत्री के तौर पर आगे किया। लेकिन जब 1995 में राजनैतिक वजहों से भाजपा के साथ मिलकर जब मायावती को मुख्यमंत्री बनाने की कोशिश कांशीराम ने की तो मुलायम के आदमियों ने गेस्ट हाउस में मायावती को बंद कर उनके साथ मारपीट किया। 1999 में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार गिरने के बाद जब सोनिया गांधी को मुलायम सिंह से पॉजिटिव वाइब मिला और वो सरकार बनाने का दावा पेश करने राष्ट्रपति भवन पहुँच गयी कि मुलायम उनका समर्थन तो करेंगे हीं। चाँद घंटो में पलटी मारते हुए मुलायम ने कहा कि वो किसी विदेशी मूल के नागरिक का प्रधानमंत्री के तौर पर समर्थन नहीं कर सकते। साल 2002 में जब एनडीए ने डॉ ऐपीजे अब्दुल कलाम के नाम राष्ट्रपति के लिए प्रस्तावित किया तो मुलायम सिंह ने मुस्लिम वोटों के मद्देनजर पीपल्स फ्रंट को ठेंगा दिखाया और कलाम के नाम का समर्थन किया। लेफ्ट पार्टियां मुलायम से तक़रीबन सात बार धोखे का शिकार हुयी है और सबसे ताज़ा घटना साल 2008 में यूपीए द्वारा प्रस्तावित न्यूक्लियर डील के मुद्दे पर थर्ड फ्रंट को धता बताते हुए सरकार को समर्थन की है। साल 2012 में जब ममता बनर्जी राष्ट्रपति के तौर पर प्रणब मुख़र्जी के नाम पर सहमत नहीं थी तब मुलायम ने उनके साथ डॉ कलाम , मनमोहन सिंह और सोमनाथ चटर्जी के नाम का प्रस्ताव किया कि इनमे से किसी को राष्ट्रपति बनाया जाना चाहिए। अगले दिन यूपीए चेयरपर्सन सोनिया गांधी से मुलाकात के बाद मुलायम ने पलटी मारते हुए प्रणब मुख़र्जी के नाम पर अपनी मोहर लगायी और ममता को अपने राजनैतिक अपरिपक्व होने का एहसास कराया।  सबसे नया वाकया इस साल संसद के मानसून सत्र का है जब कांग्रेस के नेतृत्व में सभी विपक्षी दल विदेश मंत्री सुषमा स्वराज समेत अन्य भाजपा नेताओं के इस्तीफे पर अड़े हुए थे। तब मुलायम ने पीछे हटते हुए सरकार की संसद चलने देने की पेशकश का समर्थन किया जिसकी वजह से मजबूरन विपक्ष को संसद में जारी गतिरोध से पीछे हटना पड़ा।            
अब बात करते है जनता परिवार की। पिछले लोकसभा चुनाव में मोदी लहर के कारण सपा को सिर्फ 5 सीट, जेडीयू को 2 सीट, राजद को 4 सीट, जेडीएस को 2 सीट, आईएनएलडी को 2 सीट आई है। जबकि साल 2009 के लोकसभा चुनाव में इन पार्टियों को क्रमशः 23, 20, 4 , 3 , 0 सीटें मिली थी। इस बात से ये साफ़ हो जाता है की ये सभी दल अपनी अस्तित्व को खतरे में महसूस कर रहे है। दूसरी बात ये है कि मोदी लहर को दिल्ली के अलावा किसी और राज्य में कोई चुनौती नही मिली है और तत्काल में ऐसा करने में कोई सक्षम नहीं दिख रहा है। फिर सभी पुराने कड़वाहटों को भूला कर एकजुट हुए जनता परिवार में ऐसी क्या बात हो गयी कि पहली परीक्षा के पहले हीं कुनबा बिखर गया?
सबसे पहला कारण तो सीट बंटवारे में केवल 5 सीट देने और सीट बंटवारे की प्रक्रिया में शामिल नहीं किया जाना बताया जा रहा है जिससे समाजवादी पार्टी अपने को अपमानित महसूस कर रही थी। दूसरी बात ये निकल कर सामने आ रही है कि नीतीश के कद को छोटा करने और अपने समधी लालू यादव की पार्टी को बिहार विधान सभा के सीट में बड़ा हिस्सा दिलाने के लिए ये किया गया है। तीसरी बात ये निकल कर आ रही है कि लालू-नीतीश के कांग्रेस के साथ गठबंधन से मुलायम चिढ़े हुए है। चौथी बात ये भी बताई जा रही है कि रामगोपाल यादव की दिल्ली में बीजेपी के शीर्ष नेताओं से मुलाकात के दौरान ये समझाया जाना कि बिहार में जब वो कांग्रेस से गठबंधन करेंगे तो क्या उत्तर प्रदेश में अपना मुस्लिम वोट भी शेयर करना पसंद करेंगे? सबसे अंत में जो बात समझ में आती है कि मुलायम सिंह यादव के खिलाफ आय से अधिक सम्पत्ति का मामला अभी भी ख़त्म नहीं हुआ है। पिछले दिनों मुलायम ने ये बयान भी दिया था कि पिछली सरकार ने सीबीआई का दुरूपयोग किया था और मोदी सरकार भी यही कर रही है।

अब वजह चाहे जो भी हो मुलायम सिंह यादव की राजनीतिक कलाबाजियां कोई नयी बात नहीं रही है। ये अलग बात है कि जनता परिवार इस बार उनका नया शिकार बना है।

सोमवार, 31 अगस्त 2015

आरक्षण : जरुरत किसकी?

आरक्षण : जरुरत किसकी?
31/08/2015:नई दिल्ली। गुजरात से शुरू हुए पटेल समुदाय के आरक्षण आंदोलन ने लगभग पूरे देश को इसकी चपेट में ला दिया है। कल पाटीदार अनामत समिति के हार्दिक पटेल ने दिल्ली में कहा कि इस आंदोलन को देशव्यापी बनाया जाएगा और गुर्जर तथा कुर्मी समुदाय को भी इसमें शामिल किया जाएगा। आज पश्चिमी उत्तर प्रदेश के बागपत जिले में जाट समुदाय ने जाट आरक्षण बचाओ महारैली में आंदोलन करने और पूरे देश में चक्का जाम करने की धमकी दी है। जाट नेताओ ने कहा कि अगर पटेल उनके आंदोलन में साथ देंगे तो बदले में वे भी उनके आंदोलन में शामिल होंगे। इन सभी बातों से एक ही सवाल खड़ा होता है कि आखिर आरक्षण की जरुरत किसको है और है भी तो क्यों?
इस सवाल का हल ढूंढने के लिए हमें संविधान निर्माताओं के उस विचार को समझना होगा जिसकी वजह से उन्होंने आरक्षण देने का प्रावधान किया था। 30 नवम्बर 1948 को संविधान सभा में श्री कन्हैया लाल माणिक लाल मुंशी ने डॉक्टर आम्बेडकर के सिर्फ बैकवर्ड क्लास को आरक्षण देने पर सवाल उठाते हुए कहा कि संविधान में कही भी इसे परिभाषित नहीं किया गया है। उन्होंने ये भी कहा की स्टेट ऑफ़ मुंबई ने इसे परिभाषित किया है जिसमे न सिर्फ अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति बल्कि अन्य जातियों को भी इसमें शामिल किया गया है जो आर्थिक, शैक्षिक और सामाजिक तौर पर पिछड़े है। इस बहस में उत्तर देते हुए डॉ आम्बेडकर ने कहा कि पिछड़े वर्गों का निर्धारण करने का अधिकार राज्य सरकारों के ऊपर छोड़ देना चाहिए। पिछड़े वर्गों का निर्धारण करने और आरक्षण देते समय हमें दो बातों को ध्यान में रखना होगा। पहला ये कि जिन समुदायों को हम आरक्षण देने जा रहे है क्या उनका सरकार और सरकारी नौकरियों में समुचित प्रतिनिधित्व अब तक नहीं हो पाया है? दूसरा ये की क्या उन्हें आरक्षण देने से सामान अवसर के सिद्धांत का उल्लंघन तो नहीं होगा। श्री एच एन कुंजरू ने इसे निश्चित समय सीमा(दस साल्) तक ही लागू करने का प्रावधान करने की सलाह दी।
इस बात से ये तो स्पष्ट है कि संविधान निर्माताओं की मंशा थी कि आरक्षण का लाभ सिर्फ उनको मिलना चाहिए जिनका समुचित प्रतिनिधित्व अब तक नहीं हो पाया है। लेकिन वोट बैंक पॉलिटिक्स के चक्कर में 10 साल के इस आरक्षण को समय समय पर विस्तार दिया गया ताकि वो इसके सहारे के आदि हो जाये और उनकी ये आदत बनी रहे और वो कभी आत्मनिर्भर नहीं हो पाये। साल 1989 में जब जनता दल की सरकार बनी तो इसे और वीभत्स रूप दिया गया और आम्बेडकर के उपरोक्त विचारों को कुचल दिया गया। कांग्रेस से अलग हुए वी पी सिंह ने कांग्रेस की इस पालिसी को और ही खतरनाक रूप देते हुए समाज में विभाजन की एक गाढ़ी लकीर खींची जिसे आजतक समाज झेल रहा है। तत्कालीन सरकार के इस कदम का परिणाम ये हुआ कि पूरे देश में अगड़े और पिछड़े के नाम पर आंदोलन शुरू हुआ। इस आंदोलन से पूरे देश में सैकड़ों जाने गयी और आर्थिक नुकसान की तो बात न ही करे तो बेहतर होगा। 

आज जो लोग आरक्षण का लाभ ले रहे है तथा जो इसके लिए मांग या फिर आंदोलन कर रहे है उन्हें कुछ सवालों के जवाब खुद तलाशने की जरुरत है। पहला सवाल ये है कि क्या वाकई में उनके समाज का सरकार और सरकारी नौकरियों में समुचित प्रतिनिधित्व नहीं हो पाया है? सवाल नंबर दो ये कि क्या उनके समाज को आरक्षण देने से कहीं ये सामाजिक ताना बाना (सोशल फैब्रिक) या कहें तो सामान अवसर के संवैधानिक वादे का अवसान तो नहीं हो जाएगा। अगर इन दोनों सवालों का जवाब अगर नहीं है तो उस समाज को आरक्षण की सख्त जरुरत है। यदि इन सवालों के जवाब हाँ में हुए तो फिर उन्हें अपने इस आरक्षण या इसकी मांग को छोड़कर समाज की मुख्यधारा में शामिल होने की जरुरत है क्यूंकि आरक्षण का मूल उद्देश्य ही यही है। सोंचिये और तलाशिये इन दोनों सवालों के जवाब ………किसी और से नहीं बल्कि खुद से।         

शुक्रवार, 28 अगस्त 2015

(Bihar Election-An Perspective) बिहार चुनाव के परिदृश्य

बिहार चुनाव के परिदृश्य
28 अगस्त। बिहार विधान सभा चुनाव इस बार काफी रोचक होता जा रहा है। आठ साल बीजेपी के साथ सरकार चलाने के बाद नीतीश कुमार इस बार लालू यादव और कांग्रेस के साथ कंधा से कंधा मिलाकर चलने को तैयार है। समाजवादी पार्टी, जद-यू और राजद समेत 6 पार्टियों के इस गठजोड़ का पहले विलय होना तय हुआ था लेकिन विलय पर आपसी सहमति नही बन पाने के कारण महागठबंधन का नाम दिया गया। वहीं बीजेपी अपने एनडीए पार्टनर लोजपा और रालोसपा के अलावे जीतन राम मांझी की हिंदुस्तान आवाम मोर्चा के साथ मैदान में है।
हाल के दिनों में बिहार के मुख्यमंत्री की दिल्ली के मुख्यमंत्री और आम आदमी पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल से बढ़ती हुई करीबी राजनीतिक हलको में चर्चा का विषय बनी हुई है। इस करीबी के कई मायने निकाले जा सकते है। पिछले साल हुए लोकसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी ने बिहार में सभी सीटों पर चुनाव लड़ा था और परिणाम जगजाहिर है। लोकसभा चुनाव 2014 में केजरीवाल ने नीतीश कुमार और लालू यादव पर जम कर हमला बोला था और बिहार की दुर्दशा के लिए जिम्मेदार ठहराया था। पिछले एक साल में ऐसा क्या करिश्मा हुआ कि केजरीवाल के लिए वही नीतीश कुमार विकास पुरूष लगने लगे है?

इस सवाल के कई मायने और मतलब हो सकते है, लेकिन सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि आज की तारिख में दोनो की राजनीती एक ही मुद्दे पर टिकी हुई है और वो है मोदी विरोध और अल्पसंख्यको का मसीहा बनने का। लोकसभा चुनाव के पहले से ही नीतीश मोदी के मुखर विरोधी रहे हैं और बीजेपी से गठबंधन भी इसी वजह से तोड़ा था। बिहार के मुख्यमंत्री को ये डर था कि अगर मोदी को नेता स्वीकारते है तो वो अल्पसंख्यक वोट बैंक से हाथ धो बैठेंगे और दूसरा ये कि वो खुद को भावी प्रधानमंत्री के तौर पर देख रहे थे। खुद को बदलाव और स्वच्छ राजनीती का चैंपियन मानने वाले केजरीवाल की पूरी राजनीती भाजपा और कांग्रेस के विरोध से शुरू हुई लेकिन बाद में वो कांग्रेस के साथ 49 दिन की सरकार बैठे। इस साल के दिल्ली विधानसभा चुनाव में केजरीवाल का मुख्य मुद्दा बीजेपी का विरोध रहा। दिल्ली में सरकार बनने के बाद से ही मुख्यमंत्री केजरीवाल लगभग हर मुद्दे पर केंद्र से टकराव का रूख अख्तियार किये हुए है। शायद यही वो वजहें है जो दोनो नेताओं को करीब ले आइ है। केजरीवाल की चुनावी सफलता में अहम योगदान प्रवासी बिहारी वोटरों का रहा है और नीतीश को ये लगता है कि आप के मुखिया के जरिये उन वोटरों और उनके घर-परिवार और रिश्तेदारों में पैठ बनाकर बिहार का किला फतह कर लेंगे। परिणाम तो आने वाला वक़्त हीं तय करेगा। 

गुरुवार, 27 अगस्त 2015

आरक्षण - विचारणीय विषय(Reservation - An issue to consider)

आरक्षण - विचारणीय विषय

पूरा गुजरात आज पटेल समुदाय के लिए आरक्षण की मांग की आग में झुलस रहा है। गुजरात के अहमदाबाद, सूरत और मेहसाणा में कर्फ्यू लगा दिया गया है और 3 लोगों के मरने की भी खबर है। मंगलवार से जारी हिंसा में सरकारी सम्पति का नुक्सान सर्वाधिक हुआ है। कई शहरों में सरकारी दफ्तरों, बसों और सरकारी वाहनो और जनप्रतिनिधियों को निशाना बनाया जा रहा है। पूरे राज्य में 150 से अधिक गाड़ियोंजिनमें 70 से अधिक सरकारी बसें और कई पुलिस वाहन भी शामिल हैं, तथा कई सरकारी कार्यालयों को जला दिया गया। बसों में से 30 अहमदाबाद में तथा 25 सूरत में जलायी गयी। अहमदाबाद, सूरत और राजकोट में बीआरटीएस बस सेवा के जनमार्ग को भी व्यापक नुकसान पहुंचाया गया। भीड ने कई पुलिस चौकियों को भी जला दिया। कुछ स्थानों पर पुलिसकर्मियों को निशाना बनाया गया। अहमदाबाद में अकेले व्यापारियों और व्यवसायी समुदाय को तक़रीबन 3500 करोड़ का नुकसान उठाना पड़ा है। पाटीदार अनामत आंदोलन समिति द्वारा चलाये जा रहे इस आंदोलन का नेतृत्व एक 22 वर्षीय नौजवान हार्दिक पटेल कर रहे है।

आधुनिक भारत के निर्माता सरदार पटेल को अपना आदर्श मानने वाले पटेल समुदाय गुजरात में सबसे समृद्ध समुदाय माना जाता है। गुजरात में कुल आबादी में करीब 20 फीसद तक पटेल समुदाय के लोग है। गुजरात की राजनीति में पटेल समुदाय के दबदबे का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि राज्य के बीजेपी के 120 विधायक में से 40 विधायक इसी समुदाय से आते है। राज्य की पहली महिला मुख्यमंत्री समेत 5 मंत्री भी इसी समुदाय से आते है। फिर भी आज ये समुदाय आरक्षण मांग रहा है। ऐसा नही कि सारे पटेल समृद्ध है उनमें भी एक तबका ऐसा है जिन्हें वाकई में आरक्षण की जरुरत है। लेकिन हिंसात्मक आंदोलन के जरिए किसी भी समस्या का समाधान ढूंढ़ना नामुमकिन है।
आज पूरे देश में आरक्षण की मांग करने वालों की तादाद तेजी से बढ़ी है। ऐसा इसलिए हुआ है क्योंकि लोगो को लगने लगा है कि आरक्षण के जरिए वो आसानी से किसी बड़े संस्थान में दाखिल हो जायेंगे फिर पढ़-लिखकर अच्छी सरकारी नौकरी में आ जायेंगे। इसके दो पहलू है- एक तो ये कि उन्हें ना तो पढ़ने के लिए और ना ही नौकरी के लिये सामान्य वर्ग के छात्रों जितनी मेहनत करनी होगी और दूसरा ये कि आरक्षण के आधार पर सरकारी नौकरी मिलने में सामान्य वर्ग की तुलना में आसानी होगी जिसमें उन्हें काम कम करना पड़ेगा। लोगों की ये मानसिकता खासकर नई पीढ़ी की ये सोंच राष्ट्र के लिये घातक है। जहां भारत वैश्विक परिदृश्य में सबसे बड़े युवा श्रमशक्ति वाले देश के रूप में पहचान बना चुका है उस देश की युवा पीढ़ी की ये सोंच आत्मघाती साबित होगी।


आज जरूरत इस बात की है कि देश को जातिगत आरक्षण से अलग आर्थिक आधार पर आरक्षण के बारे में पहल करना चाहिए। जरूरतमंद हर जाति और धर्म में मौजूद है जो आर्थिक रूप से विपन्न है, जिन्हें आरक्षण की दरकार है, लेकिन वो इससे वंचित है सिर्फ इस आधार पर कि उसका जन्म किसी अगड़ी जाति में हुआ है। आर्थिक आधार पर आरक्षण देने का मतलब ये होगा कि इसका लाभ सिर्फ जरूरतमंद को मिलेगा जो हर जाति और धर्म का होगा। कालक्रम में शायद सामाजिक विषमता जो हर ओर नजर आती है, से छुटकारा पाने में कारगर साबित होगा जो आरक्षण देने का मुख्य तर्क और आधार है।