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शुक्रवार, 2 अक्टूबर 2015

सफाई के मायने

­­­­­­सफाई के मायने
02/10/2015, नई दिल्ली। आज देश के दो महापुरुषों का जन्मदिवस है। आधुनिक भारत के वर्तमान स्वरूप का निर्माण करने में इनका महत्वपूर्ण योगदान माना जाता है। अहिंसा के पुजारी गांधी जी और जय जवान-जय किसान के प्रणेता पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री जी के जयंती पर शत्-शत् नमन। 2014 में केंद्र में नई सरकार आने के बाद महात्मा गांधी के जयंती को स्वच्छता से जोड़ कर देखा जाने लगा है। सरकार ने स्वच्छता के लिए अभियान चलाया है और भारत को स्वच्छ और निर्मल बनाने की योजना बनाई है। लेकिन केवल सरकारी योजनाओं से क्या भारत स्वच्छ हो पायेगा? जवाब नही में है। भारत के अधिकांश नागरिकों का सफाई के प्रति सरोकार बहुत कम है या नही के बराबर है। खुले में शौच करना, कूड़ा इधर-उधर फेंकना या बिखेरना, यत्र-तत्र थूकना और मलबों का सही तरीके से निपटारा नही करना जैसे अनेक कारण है जिसके वजह से भारत में सर्वत्र गंदगी देखने को मिलती है। इस गंदगी की वजह से अनेकों समस्या या बीमारियां पैदा होती है।

मंगलवार, 22 सितंबर 2015

डेंगू का डंक

डेंगू का डंक

22/09/2015, नयी दिल्ली। कल साकेत स्थित एक निजी अस्पताल में जाने का मौका मिला। पहले भी कई बार उस अस्पताल में मैं अपने सगे-संबंधियों के इलाज के सिलसिले में वहां जाता रहा हूँ। लेकिन कल  वहां के बदले हुए हालत ने मुझे चौका दिया। निजी अस्पताल होने के नाते वहां एक बड़ा वेटिंग हॉल हुआ करता था जिसमें आमतौर पर मरीज और तीमारदार इंतजार किया करते थे। उस हॉल को घेर कर वार्ड बना दिया गया है। पूछने पर पता चला कि उस नये लेकिन अस्थायी वार्ड में भर्ती सारे मरीज डेंगू के है। देश की राजधानी में डेंगू से मरने वालों की संख्या दिनोदिन बढ़ती जा रही है। सरकारी आंकड़ो में अब तक 17 मौत दर्ज है लेकिन राजधानी दिल्ली में हीं ये संख्या 34 के करीब है। दिल्ली से सटे गाजियाबाद और नोएडा में 10 और 11 मौत की खबर है। सिर्फ पिछले हफ्ते दिल्ली में 1919 नये मरीज सामने आये है जबकि इस सीजन में ये संख्या 3791 तक पहूँच गयी है। पूरी दुनिया में डेंगू को कहीं भी जानलेवा बीमारी नही माना जाता और इसका इलाज बिल्कुल संभव है। सवाल ये उठता है कि आखिर दिल्ली में ये इतना भयावह और जानलेवा कैसे बन गया। सितम्बर 2006 में पहली बार दिल्ली में सामने आये इस बुखार से सिर्फ 886 मरीज प्रभावित हुए थे। तब से साल दर साल ये बुखार दिल्ली को अपने चपेट में लेता आ रहा है। हर साल होने वाले इतने सारे मौत के बावजूद भी इस पर नियंत्रण के अब तक के उपाय नाकाफी साबित हो रहे है। सवाल ये उठता है कि नगर-निगम, दिल्ली सरकार और केंद्र सरकार सारी जानकारी के बावजूद इसके नियंत्रण के उपाय क्यों नही कर पाये? बारिश के मौसम शुरू होने के पूर्व किसी तरह की तैयारी क्यों नही की गई? वर्तमान केंद्र सरकार और दिल्ली की सरकार दोनों को जनता ने भारी बहुमत देकर भरोसा जताया कि शायद अब उनकी परिस्थितियां बदलेगी लेकिन जनता के हाथ सिर्फ निराशा ही आयी है। दिल्ली की सरकार अपनी हर असफलता के लिये केंद्र सरकार को दोषी ठहराती है। दिल्ली के लोगों का कल्याण कैसे हो इसके लिये काम करने के बजाय अपना महिमामंडन करना दिल्ली की सरकार की आदत बन गई है। नगर निगमों को फंड मुहैया नही कराने के नित् नये बहाने लाकर दिल्ली सरकार केंद्र पर निशाना साधती रहती है क्योंकि केंद्र और निगमों में एक ही पार्टी की सरकार है। अलग तरह की राजनीति करने का दंभ भरने वाली पार्टी की राय शायद सरकार में आने के बाद ये हो गई है कि आम आदमी से क्या लेना-देना, मरते हैं तो मरने दो। डेंगू से लड़ने के लिये तैयारी की क्या जरूरत है जी जब होगा तो देख लेंगे। इस विचारधारा से उपर उठ कर अगर बरसात के मौसम से पहले इसके लिये कमर कस ली जाती तो शायद 34 जानें नही जाती। बरसात का मौसम अचानक तो आता नही और साल-दर-साल आता है। डेंगू की फितरत भी कुछ इसी तरह की है। बचाव के लिये जागरूकता अभियान का नही चलाना, अस्पतालों में समय पर पर्याप्त इंतजाम नही कर पाना और डेंगू की शुरूआत के बाद इसके फैलाव को रोकने के सही इंतजामात नही करना सरकारी तंत्र की विफलता के लक्षण हैं। तो फिर इससे लड़ने की तैयारियों का जिम्मा कौन उठायेगा? दिल्ली की जनता को जागना होगा और इस जिम्मेदारी को अपने हाथों में लेनी होगी। तब जाकर दिल्ली की जनता का कल्याण होगा।         

शुक्रवार, 18 सितंबर 2015

डायबीटीज – एक खामोश हत्यारा

डायबीटीज – एक खामोश हत्यारा
1/09/2015 - नई दिल्ली। आज सुबह अखबार के पहले पन्ने पर एक खबर देखी – अमेरिका में 3 साल की बच्ची को डायबीटीज टाईप -2 रोग से पीड़ित पाया गया है। शायद ये बच्ची दुनिया की सबसे कम उम्र की डायबीटीज रोगी है। इस बच्ची का वजन 35 किलो है और वो मोटापे से ग्रसित है। दुनिया भर में डायबीटीज एक खतरनाक रोग बन कर उभरा है। दुनिया की आबादी का 8.3 प्रतिशत हिस्सा या करीब 38.7 करोड़ लोग इस रोग से पीड़ित है। विश्व भर में बच्चों में टाईप-2 डायबीटीज की बीमारी नाटकीय रूप से बढ़ी है और इसकी वजह है मोटापा।
डायबीटीज रोग में मरीज के शरीर में ग्लूकोज की मात्रा बढ़ जाती है और कारण होता है आग्न्याशय (पैनक्रियाज) द्वारा इंसुलिन का उत्सर्जन सही मात्रा में नही करना। मनुष्य द्वारा खाने में जो कार्बोहाइड्रेट लिया जाता है उसे पाचन तंत्र ग्लूकोज में बदलते है और ये इंसुलिन के जरिये खून में मिलकर मनुष्य के शरीर में उर्जा का संचार करता है। जब इंसुलिन का इंसान के शरीर में सही मात्रा में उत्सर्जन नही होता तो खून में ग्लूकोज की मात्रा बढ़ने लगती है और इस अवस्था को डायबीटीज या मधुमेह के नाम से जाना जाता है। डायबीटीज मूलतः दो तरह का होता है- टाइप – 1 और टाइप – 2। डायबीटीज टाइप -1 में मरीज के शरीर में इंसुलीन नही बनता या ना के बराबर बनता है। इसमें मरीज को इंसुलीन पर निर्भर रहना पड़ता है और इंसुलिन नही लेने पर मरीज की मौत भी हो सकती है। इस प्रकार का मधुमेह वैसे तो किसी भी उम्र में हो सकता है परंतु ज्यादातर बच्चे और युवाओं में पाया जाता है। टाइप-2 में मरीज के शरीर में पर्याप्त मात्रा में इंसुलिन संतुलित मात्रा में नही होता है और तकरीबन दुनिया के कुल डायबीटीज मरीजों में 90 प्रतिशत इस तरह के होते है। इस तरह के मरीजों के शरीर में इंसुलिन प्रतिरोधक क्षमता विकसित हो जाती है या फिर इंसुलिन पर्याप्त मात्रा में नही बन पाता है। ये किसी भी उम्र में हो सकता है लेकिन इसका मोटापा से कोई लेना-देना नही है।
दुनिया भर के विशेषज्ञों का मानना है कि डायबीटीज जीवन-शैली संबंधित रोग है। लेकिन कम उम्र के युवाओं और बच्चों में इस बीमारी का फैलना चिंता का विषय है। टेक्नोलॉजी के बढ़ते प्रभाव की वजह से बच्चे टीवी, कंप्युटर और विडियो गेम का इस्तेमाल ज्यादा करने लगे है। ऐसे में बच्चों की शारीरिक गतिविधियां बहुत हीं कम हो गयी है। खेल के मैदान में बच्चे समय कम से कम दे रहें है और खानपान की शैली भी मौजूदा समय में बहुत ही असंतुलित हो चला है। जंक फूड का ज्यादा इस्तेमाल ऐसी परिस्थिति में कोढ़ में खाज की तरह साबित हो रहा है। इन सारी वजहों से उनमें मोटापा तेजी से बढ़ रहा है। इस कारण युवाओं और बच्चों में टाइप-1 डायबीटीज तेजी से बढ़ रहा है। बच्चों में संतुलित खानपान और शारीरिक क्रियाकलाप को बढ़ावा देना इससे बचने में मदद करेगा।

भारत में 1971 में 1.2 फीसदी लोग डायबीटीज से पीड़ित थे लेकिन सन 2000 आते-आते ये तादाद 12 फीसद हो चुकी थी। एक अनुमान के मुताबिक 2011 में भारत में 6.13 करोड़ लोग इससे पीड़ित हो चुके थे और ये तादाद सन 2030 तक बढ़ कर 10 करोड़ के पार हो जायेगी। साल 2012 में करीब 10 लाख भारतीय इसकी वजह से मौत के शिकार हो चुके है। पश्चिमी देशों की तुलना में भारतीय करीब डायबीटीज होने के उम्र के 10 साल पहले ही इसका शिकार हो जाते है। जीवन शैली में बदलाव जैसे कम शारीरिक मेहनत, सुस्त दिनचर्या, चीनी और वसा का ज्यादा इस्तेमाल इसके प्रमुख कारण है। इन सबके अलावा एक अहम कारण जो निकलकर सामने आयी है वो है भागदौड़ और तनावपूर्ण जिंदगी। महानगर के अलावा ग्रामीण जनसंख्या भी तनाव की चपेट में है। भौतिक सुख और विलासपूर्ण जीवन की लालसा ने मनुष्य को इसके तरफ ढ़केला है। डायबीटीज के वजह से हृदय रोग, तंत्रिका तंत्र की समस्या, किडनी खराब होना और आँखों में रेटिना संबंधित बीमारी आम है। इससे बचाव के लिये जीवन शैली में बदलाव लाना सबसे महत्वपूर्ण है। नियमित जीवनशैली, संतुलित खानपान और जानकारी द्वारा हीं इस महामारी से बचा जा सकता है।